‎//संवेदना//--लेख

 ‎//संवेदना//


‎पुराना मैला कंबल ओढ़े बस की एक खाली सीट पर बैठी बूढ़ी भिखारन को देख, बस कन्डक्टर का पारा सातवें आसमान पर चढ़ने लगा। तू फिर आ गई!? अभी बोहनी भी नहीं हुई है और सीट जमा कर बैठ गई। किराया कौन तेरा बाप देगा? भिखारन कहीं की! सबेरे–सबेरे तेरा मुँह देखना पड़ता है। कंडक्टर गाली देते हुए तिरछी नज़र से देखने लगा।

‎थोड़ी देर बाद कुछ महिलाएं बस में चढ़ने लगीं। सीट खाली न होने के कारण खड़ा रहना पड़ा। कंडक्टर ने बूढ़ी भिखारन के दोनों हाथ पकड़ सीट से उतारना चाहा लेकिन भिखारन जम कर बैठ गई और बोलने लगी- "ए मोर बस है।" चुप कर पगली! मुँह बंद कर देख तेरी वजह से महिलाएं खड़ी हैं; शर्म नहीं आती तुझे, बिल्कुल भी दिमाग नहीं है। ड्राइवर के साथ–साथ सारे यात्री उसके बारे में अनर्गल बातें करने लगे। बिचारी बूढ़ी औरत चुपचाप आँखें बंद कर बैठ गई। बस की सारी सीटें भर चुकी थी।

‎कहीं दूर.....बस, एक गर्भवती महिला के पास जा कर रुकी। महिला अंदर आई। चेहरे से थोड़ी बीमार लग रही थी। उसने अपनी नज़र बस के हर एक कोने में घुमाई और मायूस हो कर पीछे खड़ी हो गई। भीड़ बहुत थी लेकिन उस गर्भवती महिला को सीट देने के लिए कोई तैयार नहीं था। बिचारी बोलने लगी थोड़ी सी जगह दे दो बैठने के लिए मेरी तबीयत ठीक नहीं है, लेकिन हर एक की जुबान एक ही बात कह रही थी, हम भी पैसा दिए हैं; मुफ्त में थोड़ी न चढ़े हैं बस में, हम क्यों अपनी सीट दें। तभी उस बूढ़ी भिखारन की नज़र गर्भवती महिला पर पड़ी, कुछ बड़बड़ाती हुई उस महिला का हाथ पकड़ कर अपनी सीट पर बिठाई और अनजान स्टेशन में उतर गई। लोग आश्चर्य से बूढ़ी भिखारन को देखने लगे; वहीं बाकी लोगों की मानवता धूल-धूसरित होते हुए नजर आ रही थी।

‎//रचनाकार//

‎प्रिया देवांगन "प्रियू"

‎राजिम

‎जिला - गरियाबंद

‎छत्तीसगढ़



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